माहुर डंड़ आगुआन

राजेश महतो


कुड़मी सेना के हुंकार से
कांप उठा दिल्ली के आसमान
कुड़मी नौजवान की धड़कन में उतरा
एक ही नाम "माहुर डंड़ अगवान"

जब तक चांद सूरज उगते रहेगा
नील गगन की बाहों में।
कुड़मी सेना हुंकार भरते रहेगा,
दिल्ली के दरबार में।
उगते सूर्य हलुद निशान के झंडा,
खेलते रहेगा कुड़मी के दिलों में।

जय़ गराम की आवाज गुंजे,
आसमान की राहों में।
गुनगुनाएगा माहूर डंड़ अगवान,
छठनागपुर के जंगलों मे ।

अपना हक अपना अधिकार के लिए,
तैयार है हम कोई भी कीमत चुकाने पर।
करते रहो दुश्मन से मुकाबला सिना तानकर,
करते रहो महुर डंड़ आगवान,जो है ख्वाबों में।

भूलने वालों ने उसे भुला दिया,
नहीं है उनका लाज।
याद करने वालों लेकर रहेंगे,
अपना हक अपना पहचान।

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